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📚 पर्वत प्रदेश में पावस

अध्याय 4

Reprint 2025-26

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🌟 लेखक परिचय

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी-अलमोड़ा में हुआ था। उन्होंने बचपन से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। मात्र सात साल की उम्र में स्कूल में काव्य पाठ के लिए पुरस्कृत हुए। उन्होंने 1915 में स्थायी रूप से साहित्य सृजन शुरू किया और छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रसिद्धि पाई।

पंत जी की आरंभिक कविताओं में प्रकृति प्रेम और रहस्यवाद झलकता है। इसके बाद वे मार्क्स और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए। इनकी बाद की कविताओं में अरविंद दर्शन का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है।

जीविका के क्षेत्र में पंत जी उदयशंकर संस्कृति केंद्र से जुड़े। आकाशवाणी के परामर्शदाता रहे और लोकायतन सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की। 1961 में भारत सरकार ने इन्हें पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया। वे हिंदी के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता भी रहे।

पंत जी को कला और बूढ़ा चाँद कविता संग्रह पर 1960 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1969 में चिदंबरा संग्रह पर ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनका निधन 28 दिसंबर 1977 को हुआ। इनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं- वीणा, पल्लव, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण और लोकायतन।

📝 पाठ प्रवेश

भला कौन होगा जिसका मन पहाड़ों पर जाने को न मचलता हो। जिन्हें सुदूर हिमालय तक जाने का अवसर नहीं मिलता वे भी अपने आसपास के पर्वत प्रदेश में जाने का अवसर शायद ही हाथ से जाने देते हों।

ऐसे में कोई कवि और उसकी कविता अगर कक्षा में बैठे-बैठे ही वह अनुभूति दे जाए जैसे वह अभी-अभी पर्वतीय अंचल में विचरण करके लौटा हो, तो! प्रस्तुत कविता ऐसे ही रोमांच और प्रकृति के सौंदर्य को अपनी आँखों निरखने की अनुभूति देती है।

यही नहीं, सुमित्रानंदन पंत की अधिकांश कविताएँ पढ़ते हुए यही अनुभूति होती है कि मानो हमारे आसपास की सभी दीवारें कहीं विलीन हो गई हों। हम किसी ऐसे रम्य स्थल पर आ पहुँचे हैं जहाँ पहाड़ों की अपार श्रृंखला है, आसपास झरने बह रहे हैं और सब कुछ भूलकर हम उसी में लीन रहना चाहते हैं।

महाप्राण निराला ने भी कहा था: पंत जी में सबसे ज़बरदस्त कौशल जो है, वह है 'शेली' (shelley) की तरह अपने विषय को अनेक उपमाओं से सँवारकर मधुर से मधुर और कोमल से कोमल कर देना।

गतिविधि: प्रकृति पर चिंतन

आपके जीवन में प्रकृति का क्या महत्व है? क्या आप कभी किसी पर्वतीय स्थान पर गए हैं? वहाँ की अनुभूति कैसी रही? यदि नहीं गए हैं, तो किसी पर्वतीय स्थान पर जाने की कल्पना करके अपने विचार व्यक्त कीजिए।

इस प्रश्न पर गहन चिंतन करें और नीचे दिए गए विकल्पों में से अपने विचारों के सबसे करीब विकल्प चुनें।

कविता

प्रश्न अभ्यास

📚 भाषा अध्ययन

पंत की कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ जानिए:

पावस का अर्थ है

प्रकृति-वेश का अर्थ है

मेखलाकार का अर्थ है

दृग-सुमन का अर्थ है

महाकार का अर्थ है

जलद-यान का अर्थ है

📝 शब्दों के प्रचलित रूप

पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप उदाहरण के अनुसार लिखिए:

उदाहरण - जिवै → जीए

पावस का प्रचलित रूप है:

प्रकृति-वेश का प्रचलित रूप है:

मेखलाकार का प्रचलित रूप है:

दृग-सुमन का प्रचलित रूप है:

महाकार का प्रचलित रूप है:

जलद-यान का प्रचलित रूप है:

🎯 गतिविधियाँ

🎧 श्रवण गतिविधि

सुमित्रानंदन पंत के जीवन के बारे में सुनिए और नोट्स बनाइए। फिर पहले बॉक्स में अपने नोट्स और दूसरे बॉक्स में एक कथात्मक विवरण लिखिए।

नोट्स:

कथात्मक विवरण:

📢 वाचन गतिविधि

कविता की निम्नलिखित पंक्तियों पर विचार कीजिए:

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश, पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।
मेखलाकार पर्वत अपार, अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़

इन पंक्तियों में प्रकृति की किन विशेषताओं का वर्णन किया गया है? कवि ने प्रकृति के चित्रण के लिए कौन-कौन से बिंब और अलंकार का प्रयोग किया है? अपने विचार व्यक्त कीजिए।

✍️ लेखन गतिविधि

प्रकृति के सौंदर्य पर एक लेख लिखिए। ध्यान दें कि आप निम्नलिखित बिंदुओं पर अवश्य चर्चा करें:

  • प्रकृति में ऋतुओं का महत्व
  • वर्षा ऋतु का सौंदर्य
  • प्रकृति और मनुष्य का संबंध
  • प्रकृति का मानवीकरण
📝 प्रकृति का सौंदर्य

प्रकृति में ऋतुओं का महत्व: प्रकृति में विभिन्न ऋतुएँ अपना विशेष महत्व रखती हैं। प्रत्येक ऋतु प्रकृति को एक नया रूप प्रदान करती है। वसंत में जहाँ प्रकृति नवजीवन से भर जाती है, वहीं गर्मियों में सूरज की तपिश से प्रकृति तपती है। वर्षा ऋतु में प्रकृति हरियाली से भर जाती है और शरद ऋतु में प्रकृति शांत और स्वच्छ हो जाती है। शीत ऋतु में प्रकृति सुप्त अवस्था में चली जाती है। इस प्रकार, ऋतुएँ प्रकृति को निरंतर परिवर्तित करती रहती हैं और इसी परिवर्तन में प्रकृति का सौंदर्य निहित है।

वर्षा ऋतु का सौंदर्य: वर्षा ऋतु प्रकृति को नया जीवन प्रदान करती है। इस ऋतु में आकाश में काले-काले बादल छा जाते हैं, जिनसे रिमझिम वर्षा होती है। पेड़-पौधे हरे-भरे हो जाते हैं और धरती हरियाली से ढक जाती है। वर्षा की बूँदों से नहाकर पत्ते चमकने लगते हैं और फूल खिल उठते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा का दृश्य और भी मनोहारी होता है। पहाड़ों से झरने बहने लगते हैं, नदियाँ उफान पर आ जाती हैं, और पर्वतों पर बादल मंडराते हैं। सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कविता "पर्वत प्रदेश में पावस" में इसी सौंदर्य का चित्रण किया है।

प्रकृति और मनुष्य का संबंध: प्रकृति और मनुष्य का संबंध अत्यंत गहरा और अटूट है। प्रकृति मनुष्य को जीवन के लिए आवश्यक सभी संसाधन प्रदान करती है - हवा, पानी, भोजन, आश्रय आदि। इसके अलावा, प्रकृति मनुष्य के मन को शांति और आनंद भी प्रदान करती है। प्राचीन काल से ही मनुष्य प्रकृति की सुंदरता से प्रभावित होता आया है और उसने अपनी कलाओं में प्रकृति को स्थान दिया है। कवियों ने अपनी कविताओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का वर्णन किया है। आधुनिक युग में, जब मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है, तब भी प्रकृति की ओर लौटने की चाह उसके मन में बनी रहती है।

प्रकृति का मानवीकरण: कविता में प्रकृति के मानवीकरण की परंपरा बहुत पुरानी है। कवि प्रकृति के विभिन्न तत्वों - पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों, आकाश, बादलों आदि को मानवीय भावनाओं और क्रियाओं से युक्त दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, "पर्वत प्रदेश में पावस" कविता में पंत जी ने पर्वतों को मानवीय विशेषताओं से युक्त दिखाया है - "अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़"। यहाँ पर्वतों को आँखें खोलकर देखते हुए दिखाया गया है। इसी प्रकार, "मेघ आए बड़े बन-ठन के" में निराला जी ने बादलों को मानवीय वेशभूषा में आते हुए दिखाया है। प्रकृति का मानवीकरण कविता को अधिक सजीव और प्रभावशाली बनाता है और पाठक को प्रकृति के करीब लाता है।

निष्कर्षतः, प्रकृति का सौंदर्य अनंत और अपार है। ऋतुओं के परिवर्तन से प्रकृति निरंतर नए रूप धारण करती रहती है। वर्षा ऋतु में प्रकृति का सौंदर्य अपने चरम पर होता है। प्रकृति और मनुष्य का संबंध अटूट है, और कवि प्रकृति के मानवीकरण के माध्यम से इस संबंध को और गहरा बनाते हैं। हमें प्रकृति के इस अनमोल खजाने की रक्षा करनी चाहिए और उसके साथ सामंजस्य बनाकर रहना चाहिए।

📚 क्या आप जानते हैं?

सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति का सच्चा चितेरा माना जाता है। उन्होंने अपनी कविताओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का इतना सजीव और सुंदर चित्रण किया है कि उन्हें "प्रकृति का सुकुमार कवि" भी कहा जाता है। वे कविता लेखन के साथ-साथ अच्छे चित्रकार भी थे और प्रकृति के सुंदर दृश्यों को चित्रित करना पसंद करते थे।

सुमित्रानंदन पंत जब कौसानी में रहते थे, तो वहां के प्राकृतिक सौंदर्य से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कई कविताएँ वहीं रहकर लिखीं। आज भी कौसानी में 'पंत संग्रहालय' है, जहां कवि की स्मृतियाँ संजोकर रखी गई हैं। छायावादी कवियों में सुमित्रानंदन पंत ऐसे कवि थे जिन्होंने अपनी रचनाओं में प्रकृति के बारीक से बारीक पहलुओं को भी अत्यंत सूक्ष्मता से देखा और उन्हें अपने शब्दों में उतारा।